
ज्ञान सरोवर में राजयोग शिविर एवं राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की रिपोर्ट
अरावली पर्वत श्रृंखला के सर्वोच्च शिखर माउंट आबू स्थित ज्ञान सरोवर में “संस्कार परिवर्तन के माध्यम से महिला सशक्तिकरण” विषय पर राजयोग शिविर एवं राष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन 18 से 22 जून 2026 तक किया गया।
महिला प्रभाग की राष्ट्रीय संयोजिका राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी शारदा दीदी ने अपने संबोधन में कहा कि जैसे एक दीपक पूरे घर को प्रकाशमान करता है, उसी प्रकार एक संस्कारी महिला न केवल समाज को बल्कि अनेक पीढ़ियों को शिक्षित एवं संस्कारित करती है। उन्होंने कहा कि संस्कार ही हमारी प्रगति का आधार हैं। आज कानून ने महिलाओं को अनेक अधिकार प्रदान किए हैं, लेकिन वास्तविक सशक्तिकरण श्रेष्ठ संस्कारों और जीवन मूल्यों को धारण करने से ही संभव है। उन्होंने कहा कि यदि महिला अपने संस्कारों में सकारात्मक परिवर्तन कर ले, तो संपूर्ण परिवार और पीढ़ियाँ परिवर्तित हो सकती हैं। इसके लिए विचारों में श्रेष्ठता और योगशक्ति की आवश्यकता है।
भोपाल से पधारी इंडो-यूरोपियन चैंबर ऑफ कॉमर्स की अध्यक्षा बहन अनुराधा ने कहा कि वास्तविक परिवर्तन राजनीति, सत्ता या धन से नहीं, बल्कि संस्कारों से आता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्था की बहनें इस सत्य की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने बताया कि एक बच्चे की पहली पाठशाला उसकी माँ की गोद होती है तथा जीवन के मूल मूल्य और संस्कार हमें किसी कानून की पुस्तक से नहीं, बल्कि परिवार और घर के वातावरण से प्राप्त होते हैं। संस्कार व्यक्ति के चरित्र की नींव हैं और इनके बिना ईमानदारी, विश्वास तथा उत्कृष्टता का निर्माण संभव नहीं है। इस अवसर पर उनकी चर्चित पुस्तक ‘Unbroken’ का भी लोकार्पण किया गया।
मुंबई से पधारी सुप्रसिद्ध अभिनेत्री बहन शशि शर्मा ने अपने जीवन अनुभव साझा करते हुए कहा कि एक महिला बेटी, माँ, दादी और समाज की मार्गदर्शक जैसी अनेक भूमिकाएँ निभाती है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ने के बाद उन्हें यह अनुभव हुआ कि मनुष्य स्वयं अपने संस्कारों का निर्माता बन सकता है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि हम महिला सशक्तिकरण की बात तो करते हैं, लेकिन क्या वास्तव में उन अनदेखे पहलुओं को समझने का प्रयास करते हैं जो महिलाओं के विकास में बाधक बनते हैं?
ज्ञान सरोवर की निर्देशिका राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी प्रभा दीदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति का स्वरूप माना गया है। सीता की सहनशीलता, पार्वती की तपस्या और दुर्गा की शक्ति प्रत्येक महिला के भीतर विद्यमान है। आवश्यकता केवल इन गुणों को पहचानने और जीवन में धारण करने की है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्व अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है और ऐसे समय में महिलाओं की सकारात्मक भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
महिला प्रभाग की अध्यक्षा राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी चक्रधारी दीदी ने कहा कि आज अधिकांश लोग अपने कार्यों के बदले प्रशंसा और मान्यता की अपेक्षा रखते हैं तथा जब यह नहीं मिलता तो निराशा उत्पन्न होती है। आध्यात्मिकता हमें सिखाती है कि संबंध और परिस्थितियाँ हमारे कर्मों का परिणाम हैं। इसलिए महिलाओं को इतना आत्मनिर्भर और आंतरिक रूप से सशक्त बनना होगा कि परिस्थितियाँ उनकी खुशी को प्रभावित न कर सकें।
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय में लीगल कंसल्टेंट बहन शिप्रा रॉय ने कहा कि महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षिक रूप से इतना सक्षम बनाना है कि वे अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सकें।
अहमदाबाद से पधारे दृष्टि फाउंडेशन ट्रस्ट के संस्थापक भाई दिनेश कुमार गौतम ने कहा कि भारतीय इतिहास में महिलाओं की गौरवशाली भूमिका रही है, किंतु समय के साथ सामाजिक संरचनाओं में ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न हुईं जिन्होंने उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर दिया। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि समाज संस्कारों के स्तर पर आत्ममंथन करे तथा महिलाओं को उनकी वास्तविक गरिमा, सम्मान और अधिकार प्रदान करे।